मेरी पुस्तक "मन दर्पण" का कवर - अप्रेल मध्य तक प्रकाशित होने की संभावना.

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मंगलवार, 29 मार्च 2016

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता.
आप अपनी माताजी के साथ दिल्ली घूमने जाते है. वहाँ कुतुब मीनार के प्राँगण में आपका की पुराना परिचित मिल जाता है. आप उससे बातें करने लगते हैं बात किसी गलत मोड़ पर मुड़ जाती है और परिचित कह पड़ता है कि यदि आप अपनी माँ से प्यार करते हैं , उनका सम्मान करते हैं तो सबके सामने यहाँ आप उन्हें प्रणाम करेंगे. आपको लगता है कि माता को प्रणाम करने में क्या हर्ज है, क्या असुविधा हो सकती है? किंतु क्या माता को प्रणाम करने के लिए किसी के कहने की जरूरत है. या कोई कहे तो माता को प्रणाम किया जाए? माता को प्रणाम करना निजी मानसिकता है और कोई अपने मन से जब चाहे कर सकता हूँ लेकिन किसी के कहने से उसे दर्शाने के लिए नहीं कि वह अपनी माँ का आदर करता है. इसकी कोई आवश्यकता महसूस नही होती कि उसे विश्वास दिलाया जाए कि वह अपनी माता का सम्मान करता है.

आप रोज प्रातः या विशिष्ट अवसरों पर , त्योहारों पर , जन्मदिन या सालगिरह पर घर पर स्वेच्छा से माता को और अन्य बड़ों को प्रणाम करते होंगे. यह आप अपनी स्वेच्छा से करते हैं. लेकिन किसी के जबरदस्ती करने पर ऐसा करने में भी संकोच होता है कि क्या हम यह किसी तीसरे को खुश करने के लिए करते हैं. क्या यह जरूरी है कि आप अपनो का सम्मान करने की तसल्ली उसे (किसी अन्य को) भी कराएँ. आपका तो पता नही कितु मेरा तो स्वाभिमान कहिए या आत्मसम्मान बीच में आता है कि वह कौन है कि उसे मेरी भावनाओं की तस्ल्ली कराऊँ.
ऐसा ही स्वाभिमान हिलोरें मारता है जब कोई मुझे जबरन बारत माता की जय या वंदे मातरम का उद्घोष करने को कहता है. में स्वेच्छा सेकितनी बार भी नारे लगाऊँ लेकिन किसी के जबरदस्ती करने पर एक बार भी लगाना जायज न समझूँ. वैसे यह तो इंसान की फितरत में ही है कि जिस काम के लिए उसे मना कीजिए वह काम करना जरूर चाहेगा और किसी काम के लिए जबरदस्ती कीजिए उसे वह करने से कतराएगा.
पति-पत्नी अपने प्यार का इजहार एकाँत में चुंबन से किया करते हैं . किसी के सामने इसे निरूपित करने के लिए यदि उन्हे ऐसा करने के लिए कहा जाए तो ???
आज हमारे देश में कुछ ऐसा ही वातावरण बनाया जा रहा है. लोगों को प्यार से नहीं जबरदस्ती से मनाया जा रहा है. किसी तरह के काम को करने या न करने को बाध्य करने की कोशिश की जा रही है. इसलिए जनता भढ़क रही है और एक असहनीय वातावरण निर्मित हो रहा है. जैसे कहा जा रहा है कि अगर भारत में रहना है तो वंदे मातरम कहना होगा. हर भारतीय को अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए भारत माता की जय कहना होगा.  गोमाँस भक्षक पाकिस्तान जाएँ. इत्यादि इत्यादि. माननीय पीठाधीश भी कह उठे हैं कि साईबाबा की पूजा अवैध है किसी को उनकी पूजा नहीं करनी चाहिए. उनके मंदिरों में तोड़फोड़ भी किए गए. क्या इस तरह के जोर जबरदस्ती से लोगों को बदला जा सकता है? यदि हाँ तो कीतने लोगों को कितने समय के लिए? तरस आता है कि उन्हें इतनी भी समझ नहीं है कि स्थिर बदलाव प्यार व प्रेम से लाया जा सकता है भय से नहीं. आतंक व भय से रोष जागेगा और जब बढ़ जाएगा तो रोष ज्वाला का रूप लेकर धधकती आग में सब कुछ जला कर रख देगी. फिर कुछ न बचेगा राख के सिवा. ये कट्टर हिंदूवागृदी यह क्यों समझ नही पा रहे हैं या नहीं समझना चाह रहे हैं कि ऐसे कट्टरवाद को अपना कर वे हिंदुत्व का भला तो दूर बुरा ही कर रहे हैं.
इस देश में जहाँ संविधान प्रत्येक नागरिक को मुलाधिकार के तहत अभिव्यक्ति की स्वच्छंदता देता है , वहाँ आप किसी भी दूसरे नागरिक को कुछभी करने या कहने के लिए बाध्य नहीं कर सकते . हाँ प्यार से आप कुछ भी करवा ले कहलवा लें. जहाँ लोग कहते फिरते हैं कि मैं तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता हूँ.. वहाँ ध्यान रहे जान दे सकने के बारे में जोरस देकर कहा गया है लेकिन जान लेने का अधिकार नहीं दिया गया है.
यहाँ तक, जब जनता के कुछ सदस्य इस तरह के कारनामों में लिप्त हैं इसे विभिन्न तरह की हरकतों मं से एक माना जा सकता है किंतु सरकार के नुमाइँदे भी इसी तरह के वक्तव्य दिए जा रहे हैं. कुछ साँसद विधायक भी इसमें लिप्त नजर आ रहे हैं. उन सबके बावजूद सरकार चुप है. इसका क्या मतलब निकाला जाए. मेरी समझतो इतना ही कहती हैकि सरकार की भी इसमें साठ गाँठ है. वह किसी तरह का रोक न लगाकर इन कट्टरवादी ताकतों को सहारा दे रही है.
भाजपा से संबंधित संगठनों ने एक नई राह भी चुन ली हिंदुत्व को बढ़ावा देने की कि जो इस रास्ते में रोड़े अटकाए उसे राष्ट्रदोही यादेश द्रोही घोषित कर दिया जाए. सरकार ने  उन्हें सरे आम छूट दे रखी है ऐसा करने की. जो उनके कार्यक्रम के विरुद्ध है सब देशद्रोही करार दिए जा रहे हैं.  पता नही संविधान की कौन सी दारा उन्हें यह अधिकार देती है.
इन कट्टर वादियों को कैसे समझाया जाए कि देश में सैहार्द का ऐसा माहौल बनाया जाए कि लोग गूढ़ तथ्यों को समझें. उनमें देश प्रेम जागे और उसके बाद उनसे कहा जाए कि इसका इजहार करने के कई तरीके हैं – जैसे जय हिंद, जय हिंदुस्तान, हिदुस्तान जिंदाबाद, जय भारत, भारत माता की जय, इंकलाब जिंदाबाद, वंदेमातरम, इत्यादि इत्यादि तो वे स्वेच्छा से ही किसी एक को चुनेंगे. और तब आपको ज्ञात हो जाएगा कि कौन देश प्रेमी है और कौन नहीं. इस प्रकार के आतंकी दबाव से लोग बिफरेंगे ही और देश में गलत माहौल पैदा हो जाएगा
विश्वविद्यालयों में पिछले कुछ वर्षों से छात्रसंघ के चुनाव बंद कर दिए गए थे. भाजपा सरकार के आते ही वे चुनाव फिर से शुरु कर दिए गए. अब फिर छात्रसघ अपनो अपने वर्चस्व की लड़ाई लड़ने लगे. जहाँ जहाँ भाजपा के संगठन उभरे वहाँ तो शाँति बनी रही लेकिन जहाँ जहाँ अन्य संघ उभरे वहाँ भाजपानीतों ने अशाँति फैलाने की पूरी कोशिश की . कुछ जगह सफल भी हुए.  इस तरह की राजनीति समजने में क्या दे की जनता असमर्थ है. क्या जनता इतना अनपढ या मूर्ख है. पता नही ये
राजनीतिज्ञ क्या समझते हैं किंतु जनता जो समझती है उसका असर तो 2019 मे दिख ही जाएगा.
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